ढाका: पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजनीति में एक नया और चौंकाने वाला अध्याय लिखा जा रहा है। 21 जनवरी 2026 की ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami) पार्टी आगामी चुनावों में जीत की प्रबल दावेदार बनकर उभरी है।
यह वही पार्टी है जिस पर 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ देने और युद्ध अपराधों के आरोप लगे थे। शेख हसीना की सरकार के दौरान इस पार्टी पर प्रतिबंध (Ban) लगा दिया गया था और इसके कई शीर्ष नेताओं को फांसी दी गई थी। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
कैसे हुआ यह बदलाव? बांग्लादेश में पिछले दो सालों में हुई राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे ज्यादा फायदा जमात-ए-इस्लामी ने उठाया है। जब अवामी लीग सत्ता से बाहर हुई और बीएनपी (BNP) आपसी कलह में उलझी रही, तब जमात ने चुपचाप अपनी पकड़ मजबूत की।
पार्टी अब ‘नया बांग्लादेश’ और ‘इस्लामिक न्याय’ का नारा दे रही है। विश्लेषकों का कहना है कि भ्रष्टाचार और गिरती अर्थव्यवस्था से परेशान जनता जमात की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है।
भारत पर क्या होगा असर? अगर जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सत्ता में आती है, तो यह भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती बन सकती है। जमात की विचारधारा को भारत विरोधी माना जाता है। ऐसे में सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और आपसी व्यापार पर बुरा असर पड़ सकता है। सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश का युवा वर्ग, जिसने क्रांति की थी, एक कट्टरपंथी सरकार को स्वीकार करेगा?
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