गाजा में सब कुछ बिखर चुका है। इमारतें मलबे में तब्दील हैं और अर्थव्यवस्था लगभग दम तोड़ चुकी है, लेकिन वहां के युवाओं का जज्बा आज भी जिंदा है। इजरायल की नाकाबंदी और लगातार हमलों ने न सिर्फ बुनियादी ढांचे को तबाह किया, बल्कि हजारों युवाओं के सपनों और पारंपरिक नौकरियों को भी खत्म कर दिया। ऐसे में, गाजा के युवाओं ने हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय जीने के नए तरीके ईजाद कर लिए हैं। इसे आप मजबूरी कह सकते हैं या उनका अदम्य साहस—वे अब ‘काम’ की परिभाषा ही बदल रहे हैं।
बेरोजगारी के संकट ने युवाओं को बदलने पर मजबूर किया
ताजा युद्ध से पहले भी गाजा की अर्थव्यवस्था बहुत नाजुक थी, लेकिन अब हालात भयावह हैं। फिलिस्तीनी केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (PCBS) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, गाजा में बेरोजगारी दर 69% तक पहुंच गई है। अगर सिर्फ 15 से 29 साल के युवाओं की बात करें, तो यह आंकड़ा लगभग 80% है। गाजा की 70% आबादी 30 साल से कम उम्र की है, जिसका मतलब है कि वहां की पूरी एक पीढ़ी बिना किसी पारंपरिक रोजगार के बड़ी हो रही है।
24 साल की हाला मोहम्मद अल-मगराबी की कहानी इस दर्द को बखूबी बयां करती है। उन्होंने 2023 में नर्सिंग की पढ़ाई पूरी की और दो साल तक अस्पतालों में इस उम्मीद में वॉलिंटियर काम किया कि शायद कभी पक्की नौकरी मिलेगी। लेकिन बिना वेतन के काम करने से न तो घर का राशन आता है और न ही किराया दिया जा सकता है। हताश होकर इंतजार करने के बजाय, हाला ने रास्ता बदल लिया। उन्होंने डिजाइनिंग और सोशल मीडिया मार्केटिंग के ऑनलाइन कोर्स किए और अब वह ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग के जरिए अपनी रोजी-रोटी कमा रही हैं।
टूटे गोदामों से डिजिटल हब तक का सफर
युद्ध की मार सिर्फ नौकरीपेशा लोगों पर ही नहीं, बल्कि व्यापारियों पर भी पड़ी है। मोहम्मद अल-हज्जाज एक समय में बड़े व्यापारी थे और उनके गोदाम खाने-पीने के सामान से भरे रहते थे। हवाई हमलों ने उनके गोदामों को मलबे में बदल दिया और सारा माल खाक हो गया। इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का धंधा पूरी तरह बंद हो गया।
लेकिन अल-हज्जाज ने हार नहीं मानी। उन्होंने देखा कि उनके पास अब क्या बचा है—उनका घर, जो काफी हद तक सुरक्षित था, और उस इलाके में कभी-कभार आने वाला इंटरनेट। उन्होंने अपने घर के एक हिस्से को ही एक छोटे ‘वर्कस्पेस’ (Workspace) में बदल दिया। आज वहां छात्र, इंजीनियर और फ्रीलांसर आते हैं—कोई ऑनलाइन परीक्षा देने, तो कोई रिमोट जॉब करने। यह जुगाड़ बहुत बेसिक है, लेकिन इसने उनके परिवार को आय का एक जरिया दिया है और समुदाय के लिए संपर्क का एक साधन।
कचरे से बिजली: गाजा का देसी जुगाड़
गाजा के युवाओं के इनोवेशन की सबसे शानदार मिसाल पेश की है अहमद फारस अबू जायद ने। उनकी छोटी सी कंपनी पहले ईंधन से चलने वाले जनरेटर से बिजली बनाती थी। लेकिन युद्ध के दौरान जब ईंधन खत्म हो गया, तो उनका काम ठप पड़ गया। शटर गिराने के बजाय, अहमद और उनकी टीम ने एक अनोखा प्रयोग किया—प्लास्टिक कचरे से ईंधन बनाना।
इस प्रोजेक्ट ने न केवल प्लास्टिक के टुकड़ों का उपयोग करके बिजली पैदा करने का सिस्टम तैयार किया, बल्कि दर्जनों युवाओं को रोजगार भी दिया। इन युवाओं ने ऐसे हुनर सीखे जो उन्हें किसी भी पारंपरिक नौकरी में नहीं मिलते।
अवसर, शोषण और धुंधला भविष्य
संकट के इस दौर में सब कुछ अच्छा ही नहीं हो रहा। सरकारी तंत्र के कमजोर पड़ने से लोगों की सुरक्षा खत्म हो गई है। मजबूरी का फायदा उठाने वाले भी सक्रिय हो गए हैं—चाहे वह साहूकारी हो, करेंसी का अवैध धंधा हो, या बाहर से पैसे मंगाने के नाम पर भारी कमीशन खाना।
फिर भी, जानकारों का मानना है कि असल समस्या हुनर की कमी नहीं, बल्कि उस हुनर को इस्तेमाल करने वाले बाजार की कमी है। इस अंधेरे में, गाजा के युवाओं का यह इनोवेशन सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं, बल्कि एक ‘शांत प्रतिरोध’ (Quiet Resistance) है। चाहे वह शेयर किया गया वर्कस्पेस हो, डिजिटल सर्विस हो, या प्लास्टिक से बिजली बनाना—हर छोटा प्रयास यह साबित करता है कि जहाँ उम्मीद खत्म होती है, वहां से गाजा के युवा नया रास्ता बनाना शुरू करते हैं।
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