अक्सर रैलियों और मंचों से हुंकार भरने वाली ममता बनर्जी आज सुप्रीम कोर्ट के शांत कमरे में एक याचिकाकर्ता के रूप में खड़ी थीं। मामला था पश्चिम बंगाल में चल रही ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) यानी वोटर लिस्ट के सुधार का। लेकिन ममता का कहना है कि ये सुधार नहीं, बल्कि बंगाल के लोगों के साथ “बुलडोजर” जैसी कार्रवाई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच के सामने ममता बनर्जी ने बहुत ही भावुक लेकिन कानूनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा, “साहब, लोकतंत्र को बचा लीजिए।” उनका आरोप है कि चुनाव आयोग जिस तरह से वोटर लिस्ट की छंटनी कर रहा है, उससे लाखों असली भारतीय नागरिक अपनी पहचान खो देंगे। उन्होंने उदाहरण दिया कि बंगाल में एक ही नाम को कई तरह से लिखा जाता है, जैसे ‘दत्ता’ को ‘Datta’ या ‘Dutta’। सिर्फ स्पेलिंग के इस मामूली अंतर को आधार बनाकर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जा रहे हैं।
ममता ने अदालत को बताया कि करीब 58 लाख लोगों के नाम पहले ही हटाए जा चुके हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जो काम 2 साल में होना चाहिए, उसे चुनाव से ठीक पहले सिर्फ 3 महीने में निपटाने की इतनी जल्दी क्या है? उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि केवल बंगाल को ही निशाना बनाया जा रहा है, जबकि बाकी राज्यों में ऐसा कुछ नहीं हो रहा।
कोर्ट में बहस के दौरान चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वे सिर्फ लिस्ट को साफ कर रहे हैं और इसमें राज्य सरकार का सहयोग नहीं मिल रहा। हालांकि, चीफ जस्टिस ने ममता बनर्जी को भरोसा दिलाया कि किसी भी असली नागरिक का नाम कटना नहीं चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे अपने अधिकारी मुहैया कराएं ताकि आयोग को बाहरी “माइक्रो-ऑब्जर्वर्स” की जरूरत न पड़े, जिनका ममता बनर्जी लगातार विरोध कर रही हैं।
ये मामला अब सिर्फ कानूनी नहीं रह गया है, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ी राजनीतिक जंग बन चुका है। अब देखना ये है कि क्या कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वोटर लिस्ट की ये प्रक्रिया और पारदर्शी हो पाती है या नहीं।
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